मेरा शरीर अवांछित जल का विसर्जन कर हल्का और ऊर्जावान बन रहा है।
जलोदर नाशक मुद्रा (जलोदरनाशकमुद्रा)
सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक · चयापचय स्फूर्ति व आंतरिक ऊष्मा
शरीर में जमे अतिरिक्त जल को घटाती है, आंखों व पैरों की सूजन कम करती है और भारीपन मिटाती है।
विधिपूर्वक हस्त मुद्रा निर्माण
मुद्रा के संपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए उंगलियों के सही स्पर्श और मेरुदंड की स्थिरता का ध्यान रखें।
सुखासन में स्थिर बैठें
पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में मेरुदंड को सीधा रखकर बैठें। कंधे ढीले और छाती खुली रखें।
हथेलियों की स्थिति
दोनों हाथों को अपने घुटनों या जांघों पर रखें। हथेलियाँ आकाश की ओर खुली रहें।
अनामिका उंगली का संस्पर्श
अनामिका (पृथ्वी तत्त्व) उंगली को मोड़कर उसके पोर को अंगूठे की जड़ (मूल) से लगाएं।
अंगूठे का हल्का दबाव
अंगूठे को अनामिका के दूसरे पोर के ऊपर रखें और हल्का दबाव डालें। शेष तीन उंगलियाँ सीधी रखें।
श्वास व ध्यान
आँखें बंद कर नाभि (मणिपूर चक्र) पर ध्यान केंद्रित करें। १५ से २० मिनट तक सहज लयबद्ध श्वास लें।
शारीरिक, सूक्ष्म व सुरक्षा प्रभाव
शारीरिक एवं जैविक लाभ
- जठराग्नि को प्रदीप्त कर चयापचय (Metabolism) तेज करता है।
- थायरॉइड ग्रंथि के स्राव को संतुलित करने में सहायक है।
- शरीर से अतिरिक्त भारीपन और सुस्ती को दूर करता है।
- दृष्टि की तीक्ष्णता और शारीरिक ऊर्जा स्तर में वृद्धि करता है।
सूक्ष्म प्राण व चक्र प्रभाव
- मणिपूर (नाभि) चक्र को जाग्रत कर संकल्प शक्ति बढ़ाता है।
- सूर्य नाड़ी (पिंगला) को सक्रिय कर उत्साह का संचार करता है।
- अतिरिक्त पृथ्वी तत्त्व को घटाकर अग्नि तत्त्व की वृद्धि करता है।
- मानसिक तमोगुण और अवसादग्रस्त विचारों को समाप्त करता है।
सावधानियां एवं निर्देश
- तीव्र ज्वर या एसिडिटी में इस मुद्रा का अभ्यास न करें।
- अत्यधिक गर्मी के मौसम में अभ्यास की अवधि सीमित रखें।
- अभ्यास के दौरान व पश्चात पर्याप्त जल का सेवन करें।
- अंगूठे से बहुत अधिक जोर न लगाएं, दबाव सहज रखें।
जिज्ञासा समाधान एवं स्पष्टीकरण
हाँ, आप कुर्सी पर दोनों पैर भूमि पर सीधे रखकर और मेरुदंड को सीधा रखकर सरलता से अभ्यास कर सकते हैं।
सूर्योदय का समय (खाली पेट) सबसे उत्तम है, क्योंकि इस समय प्राकृतिक सौर ऊर्जा हमारे आंतरिक चक्रों से सामंजस्य में होती है।
उच्च रक्तचाप या अत्यधिक पित्त वृद्धि में इसका अभ्यास केवल 5-10 मिनट तक सीमित रखें या शिक्षक के मार्गदर्शन में करें।
यह पृथ्वी तत्त्व (कफ) को कम कर अग्नि को बढ़ाती है, जिससे पाचन अग्नि तीव्र होकर वसा के अपघटन में सहायता मिलती है।
उंगलियों को सीधा रखने से विद्युत-चुंबकीय प्राणिक परिपथ (Pranic Circuit) अवरुद्ध नहीं होता और ऊर्जा का मुक्त संचार होता है।
भोजन के तुरंत बाद इसके स्थान पर वज्रासन या अपान मुद्रा अधिक उपयुक्त है। सूर्य मुद्रा भोजन से 1 घंटा पूर्व या 2 घंटे बाद करें।
