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चालीसा
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कुष्मांडा चालीसा

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अक्षर

॥ श्री कुष्मांडा चालीसा ॥

॥ दोहा ॥

हे चक्रांक, हे चक्रधर, हे जगजननी माँ।

कुष्मांडा रूप धरि, करो भक्त पर छाँह॥

॥ चौपाई ॥

जयति कुष्मांडा जयति भवानी। तुम जगजननी सुखदानी॥

कुश से मंद, हास्य से पूर्ण। तुम हो माँ, सकल सुर-शूर्ण॥

सिंह वाहिनी, अष्टभुजा धारी। त्रिशूल, खड्ग, गदाधारी॥

अमृत कलश, सिद्धियों की दाता। भक्तों के तुम हो सुखदाता॥

ब्रह्मांड रच्यो जब अंधकार। तुम हँसि कीन्हो उजियार॥

चतुर्थी तिथि तुमको प्यारी। व्रत से मिटे विपदा सारी॥

कष्ट निवारिणी, रोग विनाशिनि। तुम हो माँ, अति गुण रासिनी॥

जो तुमको ध्यावे मन लाई। सो पावे सुख सम्पति भाई॥

तुम्हरे तेज से जग उजियारा। तुम हो माँ, सकल पसारा॥

अष्टभुजाओं में अस्त्र सुहावे। देखत ही शत्रु काँप जावे॥

रक्तबीज को मार गिरायो। महिषासुर को छय कर आयो॥

तुम हो आदिशक्ति, तुम हो माया। तुम ही हो जग की छाया॥

जो पढ़े प्रेम से चालीसा। मिटे सकल दुख, होवे ईसा॥

तुम्हरे नाम से सब भय भागे। तुम हो माँ, जग के आगे॥

जो तुमको नित ध्यावे, पूजे। सो पावे सुख, न दुख दूजे॥

तुम हो माँ, परम कृपाला। तुम बिन जीवन सब आला॥

भक्तों की तुम सदा सहाई। तुम बिन कौन सुने दुहाई॥

हे माँ, तुमको शत शत वंदन। तुम हो माँ, जग के चंदन॥

॥ दोहा ॥

कुष्मांडा चालीसा, पढ़े जो नर नार।

धन-धान्य से पूर्ण हो, मिटे सकल संसार॥

पाठ पूर्ण

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