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आरती
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वैदिक आरती

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अक्षर

ॐ जय जगदीश हरे |

स्वामी जय जगदीश हरे |

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे |

ॐ जय जगदीश हरे ||

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का |

स्वामी दुःख बिनसे मन का |

सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का |

ॐ जय जगदीश हरे ||

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी |

स्वामी शरण गहूं मैं किसकी |

तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी |

ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी |

स्वामी तुम अन्तर्यामी |

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी |

ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता |

स्वामी तुम पालनकर्ता |

मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम भर्ता |

ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति |

स्वामी सबके प्राणपति |

किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति |

ॐ जय जगदीश हरे ||

दीनबन्धु दुःख हरता, तुम ठाकुर मेरे |

स्वामी तुम ठाकुर मेरे |

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे |

ॐ जय जगदीश हरे ||

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा |

स्वामी पाप हरो देवा |

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा |

ॐ जय जगदीश हरे ||

तन मन धन सब कुछ है तेरा |

स्वामी सब कुछ है तेरा |

तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा |

ॐ जय जगदीश हरे ||

जगदीश्वर जी की आरती, जो कोई नर गावे |

स्वामी जो कोई नर गावे |

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पति पावे |

ॐ जय जगदीश हरे ||

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