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आरती
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श्रीमद्भगवद्गीता

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अक्षर

जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते।

हरि हिय कमल विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥

कर्म सुमर्म प्रकाशिनि, कामासक्ति हरा।

तत्वज्ञान विकासिनि, पावन प्रेम भरा ॥

जय भगवद् गीते...

मोह विनाशिनि, ताप त्रय हरणी।

ज्ञान सुधा बरसावनि, भव भय तरणी ॥

जय भगवद् गीते...

आसुरी भाव विनाशिनी, दैवी गुण धारिणी।

सत्य सनातन धर्म की, जय जयकारिणी ॥

जय भगवद् गीते...

श्री कृष्ण मुखारविंद से, निकली पावन वाणी।

अर्जुन मोह निवारिणी, परम ज्ञान की खानि ॥

जय भगवद् गीते...

व्यासदेव कृत, महाभारत का सार।

ज्ञान गंगा बहावनि, भव सागर से पार ॥

जय भगवद् गीते...

जो कोई श्रद्धा से, नित्य करे पाठ।

भव बंधन से छूटे, पावे मोक्ष का ठाठ ॥

जय भगवद् गीते...

आरती जो कोई गावे, मन से शुद्ध भाव।

ज्ञान वैराग्य पावे, मिटे सकल कुभाव ॥

जय भगवद् गीते...

जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते।

हरि हिय कमल विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥

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