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आरती
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श्रीदशावतार

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अक्षर

जय जय जय दश अवतार, प्रभु जय जय दश अवतार।

दीन दुख हरण, भव भय तारक, मंगलमय करतार ॥

मत्स्य रूप धरि वेद बचाए, हयग्रीव को मारा।

प्रलय सिंधु में नाव खेवकर, मनु को पार उतारा ॥

मंदराचल को पीठ पर धारे, सागर मंथन कीन्हा।

चौदह रत्न दिए जग को, अमृत कलश भी दीन्हा ॥

वराह रूप धर पृथ्वी उधारी, हिरण्याक्ष संहारा।

दंष्ट्र पर धरि वसुधा को, जल से बाहर निकाला ॥

नरसिंह रूप धर खंभ फाड़कर, भक्त प्रहलाद बचाया।

हिरण्यकशिपु का वध कर, धर्म का मान बढ़ाया ॥

वामन रूप धर बलि को छाला, तीन पग भूमि मांगी।

दो पग में त्रिभुवन नापा, तीसरे में बलि को त्यागी ॥

परशुराम बन क्षत्रिय विनाशे, इक्कीस बार भू पर।

अहंकारी राजाओं का, किंचित भी न रहा डर ॥

राम रूप धर रावण मारा, सीता को छुड़वाया।

धर्म की स्थापना की, अधर्म को दूर भगाया ॥

कृष्ण रूप धर कंस संहारा, गोवर्धन उठाया।

गीता का उपदेश दिया, अर्जुन को राह दिखाया ॥

बुद्ध रूप धर शांति सिखाई, अहिंसा का पाठ पढ़ाया।

मोह माया से मुक्ति का, मार्ग जग को बताया ॥

कल्कि रूप धर कलयुग के अंत में, दुष्टों का संहार करेंगे।

धर्म की स्थापना कर, सतयुग का फिर से संचार करेंगे ॥

जो कोई यह आरती गावे, मनवांछित फल पावे।

दश अवतार की कृपा से, भवसागर तर जावे ॥

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