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आरती
आरती

श्रीभरतजी

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अक्षर

जय जय जय भरत लाल की, आरती उतारूँ आज ।

राम प्रिय, त्याग मूर्ति, अयोध्या के महाराज ॥ १ ॥

राज तिलक जब त्याग दिया, वन को चले रघुराई ।

खड़ाऊँ ले प्रभु की, सिंहासन पर धराई ॥ २ ॥

नंदीग्राम में तप किया, भोगी न सुख संसार ।

भ्राता प्रेम की ज्योति जली, अद्भुत है उपकार ॥ ३ ॥

सेवा भाव में लीन सदा, प्रभु चरण कमल चित लाय ।

धर्म ध्वजा ले हाथ में, न्याय मार्ग दिखलाय ॥ ४ ॥

चौदह वर्ष की प्रतीक्षा, पल पल प्रभु को ध्याय ।

लौटाए जब राम प्रभु, आनंद मंगल छाय ॥ ५ ॥

जो कोई आरती गावे, भरत चरण चित लाय ।

राम भक्ति और मुक्ति पावे, भव सागर तर जाय ॥ ६ ॥

पाठ पूर्ण

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