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आरती
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सर्वरूप हरि-वन्दन

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अक्षर

जय जय हरि देवा, जय जय हरि देवा ।

सर्वरूप तुम ही हो, नित्य करें सेवा ॥

तुम ही ब्रह्मा, तुम ही विष्णु, तुम ही शिव रूपा ।

सृष्टि, स्थिति, प्रलयकर्ता, तुम ही अनूपा ॥

जय जय हरि देवा, जय जय हरि देवा ।

सर्वरूप तुम ही हो, नित्य करें सेवा ॥

सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, तुम ही जलधारा ।

धरती, अंबर, वन, पर्वत, तुम ही जग सारा ॥

जय जय हरि देवा, जय जय हरि देवा ।

सर्वरूप तुम ही हो, नित्य करें सेवा ॥

तुम ही राम, तुम ही कृष्ण, तुम ही शिव शक्ति ।

गणपति, दुर्गा, सरस्वती, तुम ही सब भक्ति ॥

जय जय हरि देवा, जय जय हरि देवा ।

सर्वरूप तुम ही हो, नित्य करें सेवा ॥

घट-घट वासी, अंतर्यामी, तुम ही आधार ।

ज्ञान, वैराग्य, भक्ति दाता, भव से उद्धार ॥

जय जय हरि देवा, जय जय हरि देवा ।

सर्वरूप तुम ही हो, नित्य करें सेवा ॥

सर्वरूप हरि की आरती, जो कोई गावे ।

जन्म-जन्म के पाप मिटें, परम पद पावे ॥

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