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आरती
आरती

संकटा माता आरती

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अक्षर

जय जय संकटा भवानी, करहूं आरती तेरी।

शरण पड़ी हूँ तेरी माता, अरज सुनहूं अब मेरी॥

नहिं कोउ तुम समान जग दाता, सुर-नर-मुनि सब टेरी।

कष्ट निवारण करहु हमारा, लावहु तनिक न देरी॥

काम-क्रोध अरु लोभन के वश पापहि किया घनेरी।

सो अपराधन उर में आनहु, छमहु भूल बहु मेरी॥

खप्पर, खड्ग हाथ में धारे, वह शोभा नहिं कहत बनेरी।

ब्रह्मादिक सुर पार न पाये, हारि थके हिय हेरी॥

भव बंधन में सो नहिं आवै, निशदिन ध्यान धरीरी।

जो नर तुमको नित्य ध्यावै, संकट कटे सब तेरी॥

पुत्रहीन जो तुमको ध्यावै, पुत्र देहु सुखकारी।

निर्धन को धन देहु माता, जो ध्यावै नर नारी॥

रोग ग्रसित जो तुमको ध्यावै, रोग कटे दुखहारी।

संकट मोचन नाम तिहारो, जय जय संकटा माई॥

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