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आरती
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पञ्चायतन

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अक्षर

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा।

गणपति, रवि, अम्बा, हरि, हर, पंच देव तुम हो सुखकर॥

प्रथम पूज्य गणपति सुखकारी, विघ्न हरण मंगलकारी।

मूषक वाहन, मोदक भोग, रिद्धि सिद्धि के तुम हो योग॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

सूर्य देव तुम तेज अपारा, अंधकार के तुम संहारा।

सप्त अश्व रथ पर तुम साजे, नवग्रह मंडल में तुम राजे॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

अम्बे गौरी मैया जगदम्बे, दुष्ट दलन शुभ वरदाम्बे।

सिंह वाहिनी, खड्ग धारिणी, भक्तन की तुम कष्ट निवारिणी॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

लक्ष्मी पति श्री हरि अविनाशी, भक्तन के तुम हो सुखराशी।

शंख चक्र गदा पद्म धारी, भवसागर से पार उतारी॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

भोलेनाथ तुम डमरूधारी, त्रिशूलधारी, गंगाधारी।

कैलाशपति तुम हो अविनाशी, भक्तन के तुम हो सुखराशी॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

जो कोई आरती यह गावे, पंच देव का दर्शन पावे।

सुख संपत्ति घर में आवे, अंत समय सद्गति पावे॥

जय जय जय पञ्चायतन देवा, तुम हो सकल जगत के सेवा॥

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