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आरती
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भगवान चित्रगुप्त आरती

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अक्षर

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

विघ्न विनाशक मंगलकर्ता, सन्तन सुखदायी ।

भक्तों के प्रतिपालक, त्रिभुवन यश छायी ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

कलम दवात और पुस्तक कर में, शंख चक्र गदाधारी ।

दुष्टों को तुम दंड देते हो, सज्जन प्रतिपालककारी ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

धर्मराज जब न्याय करें, तब नाम तुम्हारा ध्यावें ।

कर्मों का लेखा-जोखा, तुम ही तो बतलावे ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

पाप पुण्य का लेखा रखते, धर्मराज के काज सँवारे ।

यमलोक में तुम ही तो, जीवों का न्याय विचारे ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

जो कोई तुमको हृदय से ध्यावे, उसकी विपदा टारे ।

संकट मोचन प्रभु तुम ही तो, भवसागर से तारे ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

दीनबंधु दुखियों के दाता, तुम ही तो हो सहारे ।

शरणागत की लाज रखते, भवसागर से तारे ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

आरती श्री चित्रगुप्त जी की, जो कोई नर गावे ।

मनवांछित फल पावे, भवसागर तर जावे ॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे ।

भक्तजनों के इच्छित, पूरण करते हरे ॥

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