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आरती
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अन्नपूर्णा माता आरती

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अक्षर

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव सब ध्यावें, तुमको ही गुण गावें ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

सूर्य, चन्द्र, पवन, अग्नि, जल, सब तुमको ही ध्यावें ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

चारों वेद, अठारह पुराण, सब तुमको ही गावें ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

जो कोई भक्त प्रेम से ध्यावे, मनवांछित फल पावे ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

जो कोई भक्त प्रेम से गावे, भवसागर तर जावे ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

अन्नपूर्णा माता की आरती, जो कोई नर गावे ॥

कहें शिवानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥

तुम ही अन्नपूर्णा देवी, तुम ही शिव मन भावे ॥

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ से अन्न पावे ॥

पाठ पूर्ण

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