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आरती
आरती

कात्यायनी माता आरती

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अक्षर

जय जय अम्बे जय कात्यायनी ।

जय जगमाता जग की महारानी ॥१॥

भक्तों की तुम हो वरदानी ।

दुष्टों का करती हो संहारनी ॥२॥

चतुर्भुजी तुम हो महामाया ।

खड्ग त्रिशूल धनुष धारी ॥३॥

सिंह वाहिनी तुम हो भवानी ।

भक्तों की करती हो रखवाली ॥४॥

नवदुर्गा में छठा रूप तुम्हारा ।

कात्यायन ऋषि की तुम दुलारी ॥५॥

जो कोई ध्यावे तुमको माता ।

मनवांछित फल पावे नर नारी ॥६॥

आरती तेरी जो कोई गावे ।

सुख संपत्ति घर में आवे ॥७॥

कात्यायनी माता की जय हो ।

सच्चे मन से जो कोई गावे ॥८॥

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