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आरती
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धर्मराज कर सिद्ध काज धर्मराज की आरती

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अक्षर

धर्मराज कर सिद्ध काज, प्रभु मैं शरणागत हूँ तेरी।

पड़ी नाव मझधार भंवर में, पार करो, न करो देरी॥

धर्मलोक के तुम स्वामी, श्री यमराज कहलाते हो।

जों जों प्राणी कर्म करत हैं, तुम सब लिखते जाते हो॥

चित्रगुप्त हैं लेखक तुम्हारे, फुर्ती से लिखने वाले।

अलग अलग से सब जीवों का, लेखा जोखा लेने वाले॥

धर्मी जन को धर्मराज, तुम खुद ही लेने आते हो।

सादर ले जाकर उनको तुम, स्वर्ग धाम पहुँचाते हो॥

पापी जन को धर्मराज, तुम खुद ही लेने आते हो।

नरक कुंड में डाल उन्हें, तुम दंडित करते जाते हो॥

यमदूतों को आज्ञा देते, पापी जन को लाने की।

यमलोक में न्याय तुम्हारा, सबको है दिखलाने की॥

जो कोई आरती तेरी गावे, मनवांछित फल पावे।

कपिल मोहन पर कृपा करिये, जपता हूँ तेरी माला॥

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