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आरती
आरती

भगवान् श्रीजानकीनाथ

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Sita-Ram मुफ़्त
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अक्षर

जय जय जानकीनाथ, जय श्री रामचन्द्र ।

दुख भंजन सुख कारण, कृपा सिन्धु रघुनन्दन ॥

आरती उतारूँ तुम्हारी, प्रभु करूँ आरती ।

भव बन्धन से मुक्ति, दे दो मुक्ति ॥ १ ॥

नील कमल सम तनु सुन्दर, धनुष बाण कर सोहे ।

मुकुट कुण्डल विराजे, मन मोहित करे मोहे ॥

सीता संग विराजे, अयोध्या के राजा ।

धर्म ध्वज धारी, भक्तन के काजा ॥ २ ॥

रावण मर्दन तुमने किया, लंकापति हारा ।

धर्म स्थापना किया, जगत उद्धारा ॥

शबरी के बेर खाए, केवट को तारा ।

भक्तों के संकट हरते, तुम हो सहारा ॥ ३ ॥

जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित मन से ।

सुख सम्पति घर आवे, कृपा तुम्हारी से ॥

दुख दरिद्र मिटे, पाप सब धुल जाए ।

अन्त काल प्रभु, तुम्हारे चरण पाए ॥ ४ ॥

आरती कीजै श्री रघुवर जी की ।

भक्तन हृदय कमल में बिराजे ॥ ५ ॥

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