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आरती
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श्री राम रघुपति की आरती

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अक्षर

बंदउँ रघुपति करुना निधाना।

जासु कृपां भव सिन्धु अपारा, पार करहिं नर बिनु श्रम नाना॥

बंदउँ रघुपति करुना निधाना॥

आरती करहिं सकल सुर वृन्दा, मुनि नारद अरु शेष फनिन्दा।

वेद पुराण संत सब गावा, जय जय जय रघुपति सुख धावा॥

बंदउँ रघुपति करुना निधाना॥

धूप दीप नैवेद्य सुहावा, पुष्प माल बहु भाँति चढ़ावा।

आरती करहिं सकल सुर वृन्दा, मुनि नारद अरु शेष फनिन्दा॥

बंदउँ रघुपति करुना निधाना॥

कंचन थार कपूर की बाती, आरती करत जनक की बेटी।

पवन पुत्र हनुमान बलकारी, आरती करत सकल नर नारी॥

बंदउँ रघुपति करुना निधाना॥

जो यह आरती प्रेम सहित गावै, मन वांछित फल निश्चय पावै।

राम लखन सीता सहित ध्यावै, भव सागर से पार हो जावै॥

बंदउँ रघुपति करुना निधाना॥

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